गढ़वाल राइफल्स

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गढ़वाल राइफल्स – शिवालिक पहाड़ियों  की गोद में बसा है लैंसडाउन। और यही से शुरुआत  होती है मध्य हिमालय की, होंटो पर “जय बद्री विशाल लाल की” हुंकार और  दिलों में ठान चुके “ युद्धाय कृत निश्चय” का प्रण लिए वीरों के शौर्य से यहां की  खूबसूरती मे 4 चांद लग जाते है  ,लैंसडाउन सन 1921 से गढ़वाल रेजीमेंट का घर रहा है। गढ़वाल राइफल की स्थापना सा 1887 मे हुई थी। 

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हिमालय पुत्र वीर गढ़वाल राइफल्स के जवान

इतिहास 

“एक कॉम जो बलभद्र सिंह नेगी जैसा आदमी पैदा कर सकती है उनकी अपनी अलग बटालियन होनी चाहिए ” । अफगान युद्ध में सूबेदार बलभद्र सिंह के अद्वितीय साहस को देखकर उस समय के कमांडर इन चीफ मार्शल एसएस रॉबर्ट्स के इन्हीं शब्दों से शुरुआत होती है गढ़वाल रेजिमेंट की स्थापना, और एक अलग शौर्य गाथा का इतिहास।

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प्रथम गढ़वाल राइफल का गठन- 5 मई 1887 (अल्मोड़ा) और 4 नवंबर 1887 में लैंसडाउन मे हुआ। इस रेजिमेंट ने अपने शौर्य की पताका एशिया ,अफ्रीका और यूरोप तक फैलाई है।अंग्रेजो ने गढ़वालियो को पहले गोरखा राइफल्स मे भरती करना शुरू किया लेकिन अलग रेजिमेंट बनने के बाद प्रथम विश्व युद्ध मे गढ़वाल राइफल ने 2 विक्टोरिया क्रॉस (NK Darwan Singh Negi and Rfn Gabar Singh Negi)  जीते और  बरतानिया हुकूमत ने इसे रॉयल के खिताब से नवाजा।

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विक्टोरिया क्रॉस
दरबान सिंह नेगी
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विक्टोरिया क्रास
गबर सिंह नेगी

1887 मे बैज से गोरखाओं की खुखरी हटाकर उसका स्थान फोनिक्स बाज को दिया गया जिसने गढ़वाल राइफल को अलग रेजिमेंट की पहचान दी। 1891 में फोनिक्स बाज का स्थान मल्टी क्रॉस ने लिया जिस पर  दा गढ़वाल राइफल्स अंकित था।

गढ़वाल राइफल्स की मैस

इतिहास की कई कहानियां समेटे हुए ये एक टाइम ट्रैवल जैसा प्रतीत होता है। मैस कम म्यूजियम ज्यादा ,दीवारों पर लगी हैं जानवरो के सर की ट्रोफिया जो ब्रिटिश शासन की याद दिलाती है, मैस का फर्श भी एक कहानी कहता है जब लैंसडाउन मे यहां तक क्रॉकरी लाई जाती थी तो उसमे से बहुत सी टूट जाती थी उन्हीं टूटी फूटी क्रॉकरी से इस फर्श का निर्माण किया गया जो 100 साल बाद भी बेहतरीन है।

गढ़वाल राइफल्स की कसम परेड तक पहुंचने तक का सफर

34 हफ्ते की बेहद मुश्किल अभ्यास जिसमे 19 हफ्ते की बेसिक ट्रेनिंग 15 हफ्ते की एडवांस मिलिट्री ट्रेनिग में एक रिक्रूट असली लड़ाई के दाव पेंच सीखता है,उसके मन से गोलियों और धमाकों का डर बिल्कुल चला जाता है,इसमें वह सीखता है जंगल मे छिपने का अभ्यास ,उसमे छिपे जानलेवा फंदों से कैसे बचे , गिल्ली सूट के साथ जंगल का ही हिस्सा हो जाना ,और भी अन्य अभ्यास। इस ट्रेनिंग का परीक्षण होता है बरफीली माना घाटी (जोशीमठ) में जहा है गढ़वाल स्काउट्स,जो लगातार घाटियों में छिपकर नजर रखती है चीन की घुसपेठ पर।

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गढ़वाल राइफल्स का महत्व

ये भारतीय सेना की सबसे ज्यादा वीरता पुरुष्कार पाने वाली रेजिमेंट है।सैनिक सेवा की ये गाथा सदियों पुरानी है,गढ़वाल को कभी मुगल हरा नहीं पाए और हर बार उन्हें नुकसान उठाना पड़ा और तो और अंग्रेज गढ़वाली रेजिमेंट के मुरीद थे ,721 गढ़वाली जवानों ने प्रथम विश्व युद्ध मे फ्रांस में बलिदान दिया ।

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अंग्रेजो के गलत हुक्म न मानने की भी एक अलग घटना है: 1930,पेशावर में सत्याग्रही पर अंग्रेजो ने जब हमला शुरू किया और इसमें गढ़वाल राइफल को शामिल होने को कहा तो उन्होंने इसमें शामिल होने से इंकार कर दिया जिसकी वजह से 66 नौजवानों का कोर्ट मार्शल किया गया।

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एक अंग्रेज अफसर ने लिखा था सायद ही  किसी भारतीय रेजिमेंट ने प्रथम विश्व युद्ध में इतना नाम कमाया हो जितना की गढ़वाल राइफल्स ने कमाया है।1962 के भारत चीन युद्ध में जब भारतीय सेना पीछे हटने लगी थी तो  4th गढ़वाल राइफल के लांस नायक त्रिलोक सिंह नेगी, गोपाल सिंह गुसाई और 22 साल के जसवंत सिंह रावत (महावीर चक्र) ने युद्ध का रुख ही मोड़ दिया और इतना ही नहीं जसवंत सिंह रावत ने अकेले 72 घंटे तक  चीनी सैनिकों से युद्ध कर 300 सैनिकों को मार गिराया अंत में उन्हें घेर कर उनका सर काट दिया गया और उनका सर अपने साथ ले गए,लेकिन उनके कमांडिंग ऑफिसर ने इस बहादुरी से प्रभावित होकर उनका सर वापस सौप दिया।

1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध में महावीर चक्र पाने वाले चंद्र नारेन सिंह ने गलूठी में घुसपैठियों मे 6 घुसपैठियों को मार गिराया बाकी घुसपेठी अपना असला बारूद छोड़ भागे ,अंत मे दुश्मनों की  मशीन गन से छलनी होकर चंद्र नारेन सिंह वीरगति को प्राप्त हुए।

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राइफलमैन
जसवंत सिंह रावत 4 Garhwal Rifles

ये गाथा यहीं नहीं रुकी गढ़वाल राइफल्स की शौर्य पताका 1971 के युद्ध ,1987 -1988 के ऑपरेशन पवन,कारगिल युद्ध तक लहराई जिसमे अनेक सैनिकों ने बलिदान दिया।

लेकिन ये सब पढ़ने के बाद अगर आपको सम्मान की भावना आए तो ठीक है लेकिन शोक की भावना को कोई भी स्थान न दे क्योंकि: अनाम गढ़वाली सैनिक की प्रतिमा के पीछे लिखे शब्द  यहां के सैनिकों के मन मे भी गहरे खुदे हुए है,जो कहते है: जो वीर लड़ाई में मारा गया हो उसके लिए कभी शोक नही करना चाहिए, क्योंकि वीर पुरुष लड़ाई मे मरकर स्वर्ग में सम्मान पाएंगे।

जय हिंद ,जय बद्री विशाल।

 RESEARCH AND WRITTEN BY

AMIT NEGI

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Amit Negi

8 COMMENTS

  1. शौर्य से भरपूर – गढ़वाल राइफल्स।
    एक बेहतरीन ब्लॉग जिसे पढ़कर हर कोई इन वीर सैनिकों से प्रेरित जरूर होगा।
    @Amit Negi,a well-researched blog🤩

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