मठियाणा देवी

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मठियाणा देवी मंदिर-Mathiyana Devi Temple-rudraprayag-uttarakhand-teamdevasthali

मठियाणा देवी – उत्तराखंड को देवी देवताओं की भूमि कहा जाता है ,और समय समय पर देवी देवताओं ने अपने अनेक रूपों से इस धरा को अपना आशीष प्रदान किया है। माता भगवती के इन्ही शक्तिशाली रूपों मैं से एक हैं मां मठियांणा ।माता मठियांणा प्रचंड शक्ति का स्वरूप हैं , इनकी कहानी सती होने के ऊपर विख्यात है।

माता मठियाणा मंदिर कैसे पहुंचे ?
How to reach mata Mathiyana temple ?

मां मठियाणा का मन्दिर उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के सिली गांव में स्थित है। यहां आने के लिए रुद्रप्रयाग से तिलवाड़ा,जखाला ,गड्डी ,उड़ीयांन गाँव ,रतनपुर ,कांडा ,नोली बैंड , घेघड़ खाल  होते हुए पहुंचा जा सकता है। सड़क मार्ग से मंदिर कि दूरी लगभग 3 किलोमीटर पैदल तय करनी पड़ती है।

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मठियाणा देवी का प्राचीन मंदिर ,रूद्रप्रयाग

माता मठियाणा का इतिहास वा लोककथा
History and folklore of mata Mathiyana 

प्राचीन कथाओं के अनुसार माता सिरवाड़ी गढ़ के राजवंशों की धियान ( बेटी) थीं।
मठियांणा एक बालिका थी जिसका जन्म गढ़ कुमाऊं के बीच हुआ था , कुछ सालो बाद ही मठियांणा के माता पिता की किन्हीं कारणवश मृत्यु हो जाती है , माता पिता के गुज़र जाने के कारण मठियांणा सीरवाड़ी गढ़ में अपनी दो फूफू और एक भतीजी के परिवार के साथ जा बस्ती है। मठियांणा कि एक मौसी मां भी थीं , (सौतेली मां) जोकि उसे बिल्कुल पसंद नहीं करती थीं। नीति माणा के प्रसिद्ध एक भोटिया राजकुमार के साथ मठियांणा का विवाह बड़ी धूम धाम हो जाता हैं।

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नीति माणा-मठियाणा देवी मंदिर-Mathiyana Devi Temple-rudraprayag-uttarakhand-teamdevasthali
भोटिया राजकुमार का गाँव ,नीति माणा

जिसे देख उसकी सौतेली मां बिल्कुल भी खुश नहीं थीं। तो हुआ यूं कि एक दिन मठियांणा अपने मैंत (माइका) अपने पति के साथ परिजनों से मिलने आइं। इतने में पति का मन हुआ गांव घूमने का तो वो अकेले ही मरुडी डंडा की ओर चले गए जहां मठियांणा की सौतेली मां रहतीं थीं। तो मठियांणा के पति को आता देख सैतेली मां ने कुछ लोगों के साथ मिल के प्रपंच रचा और उनके खाने मैं खीर और लड्डू दिए जिसमें की ज़हर मिला था , ज़हर खाते ही कुछ क्षण मे मठियांणा के पति की मौत हो जाती है , सौतेली मां उनकी लाश को गाय भेंसो के तबेले मै फेकवा देती हैं। यह सब होते हुए मठियांणा की भतीजी देख लेती है , काफी देर बाद जब मठियांणा के पति नही लौटते तो वह खुद उन्हें ढूंडने जाती हैं , भतीजी से पता चलता है कि वो तो मारुड़ी डंडा की तरफ गए थे वहां उनकी सौतेली मां ने उन्हें ज़हर देके मार दिया है।

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मठियाणा देवी के मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़

वहां यह सब देख मठियांणा बहुत फूट फूट कर रोती हैं और रोते रोते अपने पति के मृत शरीर को अकेले कंधे पर उठा के तिलवाड़ा के सूरजप्रयाग ले जाती हैं और चिता बना के आपके पति के साथ ही सती होने का प्रयास करती हैं, उनके मैती(माइके वाले) बहुत रोकने की कोशिश करते हैं पर वो नहीं मानती और सती हो जाती हैं , इसके बाद मठियांणा उसी ज्वाला मै से रौद्र माहा काली रूप में भगवती बनकर प्रकट होती हैं , और वहां से भरदार पट्टी होते हुए डांडा जाती हैं, जहां उन्हें उन पापियों के हाथों के निशान मिलते हैं और उन्हें ढूंढ के मां उनका संहार कर देती हैं। इसके बाद माता चिल्लखोलिया खाल और मडघाटू के बीच से किलांक मरती हैं और घंडियाल देवता की ऊंची धार पे पहुंचती है , जहां पर वो घंडियाल देवता से स्थान मांगती हैं तो घंडियाल देवता बोलते हैं पूरा जगत तेरे लायक है, हे मां चिलखोलिया के सामने और मडघाटू के बीच आप विराजमान हो जाएं। वहां से कीलांक मरते हुए मां सिल्ली गांव के काफी उपर एक चोटी पर शमशान घाट के सामने जाके अपना आसन ग्रहण कर लेती हैं जोकि मठियांण खाल से भी प्रसिद्ध है। फिर एक दिन सिल्ली गांव के एक नागरिक गणेश के सपने में माता आती हैं ,और बोलती हैं सिल्ली गांव के उपर शमशान घाट के सामने मेरा मंदिर बनवाओ और बरदार पट्टी के ग्यारह गांव के मेरे मैती को निमंत्रण दिया जाए।

एक और लोक कथा
Another folklore

एक कहानी यह भी है कि जब माता सती होने जाती हैं तोह वहां एक बुजु्ग आदमी गुजर रहे होते है , मठियाणा को सती होते देख उन्हें रोकने का प्रयास करते है , पर मठियाणा नहीं मानती और सती हो जाती हैं।

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दुःखी होकर जब वो आदमी वहां से जाने लगता है , तभी मां शक्ति रूप में उस अग्नि से उत्तपन होती हैं , और यह देख की एक अनजान व्यक्ति ने उनके बारे में इतना सोचा इतना समझाया इतना प्यार दिखाया जोकि उनको कभी अपने परिवार से नहीं मिला तो यह देख वो उनके पीछे पीछे रास्ते(बाट) लग जाती हैं, और जहां जहां वह बुजुर्ग आराम करने के लिए रुकते है वहां वहां माता का एक छोटा सा मंदिर है ।

माता का पूजन
worshipping of the goddess .

इस प्रकार सिल्ली गांव के ऊपर माता के एक भव्य मंदिर का निर्माण होता है , और ढोल दमऊ के साथ माता के जागर लगते हैं, और माता पस्वा (मनुष्य पर देवी देवता अवतरित होना)रूप में आके अपने सभी मैतियों और अन्य लोगों को आशीर्वाद देती हैं।

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मठियाणा देवी मंदिर

मां मठियना के दो स्वरूप हैं पहला रौद्र काली स्वरूप और दूसरा शांत वैष्णव रूप जिसमें मां अपने भक्तो को आशिर्वाद देती हैं।इस मंदिर की स्थापना चार सौ वर्ष पूर्व होना बताया जाता है। हर तीसरे साल मां के सहसा जागर लगते हैं जिसमें कि देवी कि गाथा का बखान होता है। मां मठियाणा का दरबार अत्यंत पवित्र और नैसग्रिक आभा के लिए जाना जाता है।माठियाणा देवी शक्ति का काली रूप हैं तथा ये स्थान देवी का सिद्ध पीठ है। ये अपने आप में आस्था और विश्वास का प्रतीक है। कुछ पौराणिक कथाएं अलग भी हैं कहा जाता है कि माता के अग्नि में सती होने पर भगवान शिवजी जब उनके शरीर को लेके भटक रहे थे तब माता सती के शरीर का एक भाग यहां गिरा, बाद में इस भाग को माता मठियाणा कहा गया। मान्यता यह भी है कि मां मठियाणा को भगवान शिवजी ने यहां साक्षात दर्शन दिए थे।

 RESEARCH AND WRITTEN BY

HARSH NEGI

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Harsh Negi

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