सेम नागराजा -उत्तर द्वारिका

371
8
SHARE

सम्पूर्ण विश्व धार्मिक भावनाओं, व मान्यताओं से ओतप्रोत है विश्व का जनमानस उस शक्ति के प्रति बहुत निष्ठावान हैं, जो शक्ति इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड का सन्तुलन कर रही है। सम्पूर्ण विश्व के प्राणी इस शक्ति के प्रति अपनी भावनायें अलग-अलग भावों से व्यक्त कर रहे हैं। ऐसे ही इस पुण्य भूमि भारत का जनमानस अलग-अलग भावनाओं से उस निराकार और साकार की पूजा अर्चना करता है। प्राचीन समय से इन भावनाओं को प्रमुख रूप से अनेक मान्यताओं के रूप में मानते आ रहे हैं। यहां हिन्दू धर्म वाले अपनी भावनायें ईश्वर के रूप में अर्पित करते हैं जो पूजा पाठ से मठ-मन्दिरों में निराकार शक्ति को जागृत करते हैं। हिन्दू मन्दिरों में वास्तव में शक्तियाँ जागृत हैं। मठ मंदिरों की सर्वाधिक स्थापना हिमालय क्षेत्र में है। जिसको मोक्ष प्राप्ति की सीढ़ी कहा गया है। यह क्षेत्र प्राकृतिक सौन्दर्य से भी ओत-प्रोत है, जहाँ ऊँची पर्वत श्रेणियाँ वर्ष भर बर्फ से ढकी रहती हैं। इसी हिमालय पर्वत पर करोड़ों हिन्दुओं के श्रद्धा केन्द्र बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री, कैलाश मानसरोवर, हेमकुण्ड साहिब आदि तीर्थ हैं। इसी भू-भाग पर श्री सेम नागराजा का प्रसिद्ध मंदिर है। जहाँ सम्पूर्ण गढ़वाल, जौनपुर-जौनसार और कुमाऊं के लोग दर्शनार्थ आते हैं। तथा अपने परिवार के लिए मनौतियाँ माँगते हैं।

श्री कृष्ण नागराजा की डोली व निशान अपने भाई बलराम से मिलते हुए ।

श्री सेम नागराजा मंदिर बुरांस, खरसू, मौरू, रयाल के वृक्षों के बीच 9500 फीट (2903 मी०) की ऊँचाई पर स्थित है। यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य मनमोहक है। यह मंदिर मुखेम गाँव, पट्टी उपली रमोली क्षेत्र, प्रतापनगर, टिहरी गढ़वाल (उत्तराखण्ड) के अन्तर्गत पड़ता है। इस मंदिर की स्थापना द्वापर युग से मानी जाती है। यहाँ लगभग 1300 ई० सन् से गढ़वाल रियासत के राजाओं द्वारा पूजा के प्रमाण मौजूद हैं। राज दरबार से ईष्ट, देवी, देवताओं की पूजा अर्चना के लिये आर्थिक सहयोग, श्री बद्रिका आश्रम के साथ 66 मन्दिरों को आदि काल से प्रदान की जाती है, श्री सेम-मुखेम नागराजा तथा भक्त गंगू रमोला की ईष्ट देवी भवानी जगदम्बा ‘रमोल गढ़ी’ की पूजा अर्चना के लिये भी आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। टिहरी राज परिवार के सदस्य समय-समय पर प्रभु दर्शन को आते रहते हैं।

ग्रामीण अपने ईष्ट देवता नागराजा से मिलते हुए ।

सेम नागराजा की लोक कथा 

जनश्रुति है कि द्वापर युग में अपने भक्तों के उद्धार के लिए भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों के साथ उत्तराखण्ड की यात्रा पर आये तो हरिद्वार से आगे का सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र उन्हें अपने आराध्य शंकर की नित्य-निवास स्थली मानते हुये इस देव-भूमि के प्रत्येक कंकर-पत्थर में उन्हें भगवान शंकर के दर्शन होने स्वाभाविक थे इस कारण यह सोच करके कि कहीं मेरे पाँव मेरे आराध्य के ऊपर न पड़ें उन्होंने नाग-स्वरूप (क्योंकि साँप के पाँव नहीं होते हैं) धारण कर इस देव-भूमि की यात्रा की। उस समय उनके सारे अनुचर भी नाग रूप में परिवर्तित हो गये और आज भी हम उत्तराखण्ड के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में उन नाग-रूपी कृष्ण-अनुचरों की कई नामों से पूजा करते हैं।

Read This Also : इगास बग्वाल – क्यों मनाई जाती है इगास बग्वाल?

आज उत्तराखण्ड के प्रत्येक गाँव में एक नाग मन्दिर (चाहे वह प्रतीक के ही रूप में हो) अवश्य ही दृष्टिगोचर होता है और सभी अपने गाँव के नाग मन्दिर को नागराजा मन्दिर के सम्मानित भाव से पुकारते हैं, जब कि सत्य यह है कि उत्तराखण्ड के प्रत्येक गाँव या गाँव के निकट घने वन या पहाड़ की चोटी पर स्थित किसी मन्दिर में जहाँ नाग की पूजा की जाती है वह केवल उस सेम नागदेवता के नाम के साथ नाग मन्दिर सेम के ही नाम से सम्बोधित होता है। आदि काल से सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में केवल नागों के राजा के रूप में सेमनागराजा मन्दिर-सेम (मुखेम) को ही पुकारा जाता है क्योंकि भक्तों का विश्वास है कि इस कलिकाल में केवल इस सर्वोच्च नागतीर्थ के गर्भ-गृह में स्थित नागशिला (शालिग्राम शिला) में भगवान श्रीकृष्ण के रूप में नागराजा नाम से भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं। ऐसी मान्यता है कि कृष्ण के साथ बलराम जी प्रकटा सेम में शेषनाग के रूप में विराजमान हैं।

श्री कृष्ण और बलराम जी

कुछ विद्वानों के अनुसार सेमनागराजा की स्थापना महाभारत के युद्ध के बाद हुई क्योंकि महाभारत में करोड़ों सैनिकों की मृत्यु पर भगवान का मन भी दुःखी हुआ वे अशान्त रहने लगे साथ ही इस युद्ध के बाद अपने अवतार लेने के सभी कार्य पूर्ण किये जाने पर शान्ति प्राप्त करने हेतु हिमालय को ही उन्होंने उपयुक्त स्थान माना तथा माता देवकी ने भी उन्हें कुछ दिन के लिये केदारखण्ड की यात्रा पर जाने का परामर्श दिया। श्री कृष्ण अपना राजसी रूप त्याग कर साधारण ब्राह्मण वेष में केदार खण्ड की यात्रा पर निकल पड़े। कुछ समय श्री बद्रीनारायण धाम में निवास करने के पश्चात वे तराई से होके उत्तरकाशी से सेम  मुखेम पहुंचे । भगवान  श्री कृष्ण का यहाँ आने का एक और विशेष कारण यह  था कि द्वापर युग में जब श्रीकृष्ण भगवान जी ने अवतार लिया था तो बाल्यावस्था में एक बार यमुना नदी के किनारे खेलते हुए उनकी गेंद यमुना नदी में गिर गई। जिसको लेने के लिए उन्होंने जमुना जी में छलांग मारी तो वहाँ पर कालिया नाग ने उनको लपेट लिया जिसने कि सम्पूर्ण यमुना जी को विषमयी कर रखा था अपनी शक्ति के बल पर श्री कृष्ण भगवान ने उससे अपने को छुड़ाया तथा उसके फन के ऊपर कालिया नाग को यह अहसास हो गया कि यह विष्णु अवतार हैं तथा श्री कृष्ण भगवान ने उससे कहा कि यमुना जी छोड़ दो, नाग ने कहा कि प्रभु मैं भी तो आपका ही प्राणी हूँ। मेरे लिये कोई नियत स्थान बताओ। तब श्रीकृष्ण भगवान ने उसको बोला कि हिमालय पर्वत में रमणीक देव नाम का स्थान है वहाँ चले जाओ और तपस्या करो क्योंकि तुमने यहाँ पर अपने विष के कारण कई प्राणियों की हत्या कर दी है इसका प्रायश्चित करो। तब कालिया नाग ने यहाँ तपस्या की तथा गंगू रमोला के रूप में यहाँ पर उनका जन्म हुआ वे इस मौल्या गढ के राजा बने ।  उन्होंने काई गढ़ों  (राज्य ) पर हमला कर उनको जीता तथा वे  गढ़पति बने। उस पूरे क्षेत्र पर उनका ही शासन  होता था। लेकिन उनका शासन बड़ी क्रूरता से भरा था। वे अपनी जनता पर अत्याचार करते  थे ।

भगवान कालिया नाग का उधार करते हुए

धीरे-धीरे उनका उद्धार का समय भी आने लगा और उसी कारण भगवान श्री कृष्ण ने लीला रची और उन्होंने एक ब्राह्मण भेष रख लिया । एक दिन भगवान ब्राह्मण के वेश में गंगू रमोला के पास उसके गाँव पहुँचे तथा उन्होंने उससे अपने रहने हेतु मात्र ढाई हाथ भूमि माँगी। एक साधारण भिखारी समझ कर गंगू रमोला ने उन्हें स्पष्ट मना कर चले जाने को कहा। कुछ दिन बाद भगवान ब्राह्मण के ही वेश में पुन: गंगूरमोला के गाँव पहुँचे जहाँ गंगूरमोला की पत्नी मैनावती (जिसे एक पतिव्रता एवं ईश्वर-भक्त स्त्री के रूप में जाना जाता है) ने उनका अतिथि सत्कार किया। भगवान उसके अतिथि-सत्कार से प्रसन्न होकर उसे समझाते हैं कि तुम्हारे पति के दुष्टता पूर्ण कार्यों के कारण अब तुम्हारे राज्य में भारी उत्पात होने वाला है जिससे तुम्हारा सारा पशुधन एवं ऐशवर्य भी समाप्त होने के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। अत: हे पुत्री तुम अपने पति को समझा-बुझाकर धर्म के मार्ग पर चलते हुये अपनी प्रजा का पालन करने हेतु कहो। जब मैनावती ने अपने पति को यह सब वृतान्त सुनाया तो उसने सब कुछ अनसुना कर अपने प्रजाजनों के साथ अपना व्यवहार पूर्व की ही भाँति यथावत बनाये रखा। 

गढ़पति गंगू रामोला

एक दिन गंगू रामोला अपने भेड़ बखरियों के साथ सेम के बुगयालों में भ्रहमण  कर रहा था तभी उसने देखा की एक  ब्राह्मण उससे बिना पूछे उसकी जगह पर तपस्या कर रहा है । भगवान रूपी  ब्राह्मण  ने पुनः  गंगू रामोला से मात्र ढाई हाथ भूमि मांगने की इच्छा  जताई । परंतु घमंड मे चूर गंगू रामोला ने साफ मना कर दिया तभी भगवान ने गंगू रामोला को शाप दिया जिसकी वजह से सम्पूर्ण मौल्यागढ़ में अकाल पड़ने लगा, वहाँ की सम्पूर्ण हरियाली नष्ट हो गई एवं जल स्रोत सूख गये, ऋतु चक्र बिगड़ गया, गाय, भैंसों ने दूध देना बन्द कर दिया, उनकी भेड़-बकरियाँ मरने लगी तथा अन्य कई प्रकार के अशुभ दृष्टिगोचर होने लगे। इन सबसे भयभीत हो कर उसे अपनी पत्नी मैनावती की बात याद आई कि उसके द्वार पर एक सन्त ने आकर उसे धर्म-मार्ग पर चलते हुये शासन करने की सलाह दी थी उसने गंगू रामोला को बहुत समझाया  लेकिन वह नहीं समझा । तभी एक दिन भगवान कृष्ण ने गंगू रामोला को स्वप्न मे दर्शन दे कर कहा की वे ही वो ब्राह्मण थे था वे उनका मंदिर बनाकर भगवान कृषण की पूजा करे ।

Read This Also : jwalpa-devi-real-story-ज्वालपा-देवी-

स्वप्न में मन्दिर बनाने का आदेश कुछ समय पश्चात गंगूरमोला को भगवान ने स्वप्न में उसी सन्त वेश में दर्शन दिया तथा सेम वन में मन्दिर बनाने का आदेश दिया। अपने इष्ट-देव के आदेशानुसार पवित्र भाव से अपने इष्ट-देव का सुन्दर-मंगलमय मन्दिर बनाने का दोनों पति-पत्नी ने संकल्प लिया। कथा है कि गंगूरमोला ने सेम नाम के उस पावन वन में एक भव्य मन्दिर बनवाया। मन्दिर निर्माण का कार्य रमोला की रेख-देख में कुशल कारीगरों एवं श्रमिकों के द्वारा बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह से किया गया। वह मन्दिर सात दिन में सुन्दर स्वरूप में बन कर तैयार हो गया। श्रेष्ठपंडितों से प्राण प्रतिष्ठा का शुभ-दिन निकालकर दोनों पति-पत्नी अपनी प्रजा के साथ ढोल-नगाड़ों को बजाते हुये प्राण-प्रतिष्ठा का प्रथम पूजन सम्पन्न करने हेतु वहाँ गये तो उस स्थान पर मन्दिर को लुप्त पाया। स्थान भ्रम की शंका से सभी ने घने जंगल में इधर-उधर मन्दिर को ढूंढा परन्तु कहीं भी न दिखाई देने पर गंगू रमोला ने पवित्र भाव से उसी स्थान पर दूसरी बार पूर्व की ही भाँति भव्य मन्दिर का निर्माण करने का पावन कार्य अपने उन्हीं कुशल कारीगरों के द्वारा अपनी स्वयं की रेख-देख में पुनः दूसरी बार पूर्व की भाँति पूर्ण श्रद्धा एवं उत्साह के साथ प्रारम्भ कर दिया। कहते हैं कि वह भी सात दिनों में बन कर तैयार हुआ और प्राण-प्रतिष्ठा के प्रथम पूजन से पूर्व पहले की ही भाँति लोप हो गया। इस प्रकार भक्त रमोला हिम्मत न हारते हुए पुनः पुनः उस स्थान पर भव्य मन्दिर का निर्माण करवाते रहे। संयोगवश प्रत्येक मन्दिर सात दिन में ही बन कर पूर्ण होता था और हर बार पहले की तरह प्राण-प्रतिष्ठा के प्रथम पूजन से पूर्व ही लोप हो जाता था।

सेम नागराजा प्रवेश द्वार

इस प्रकार जब छः बार बने छः भव्य मन्दिर लोप हुए तो दोनों पति-पत्नी इसे अपने पूर्व के कर्मों का पाप समझ कर बहुत निराश हुये तथा दोनों नाना प्रकार की अति कठोर व्रतों से अपने इष्ट-देव को प्रसन्न करने के लिये उनकी भक्ति करने लगे। गंगूरमोला व मैनावती की इस कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें पुनः स्वप्न में दर्शन दिया और कहा कि तुम्हारा यह पवित्र मनोरथ मैं अवश्य पूर्ण करूंगा। तुमने इससे पूर्व अपनी श्रद्धा-भक्ति से जो छः मन्दिर बनाये थे उन्हें मैंने आगे कलिकाल में अपने गुप्त निवास हेतु इसी सेम वन प्रदेश में विभिन्न स्थानों पर अदृश्य रूप से (किसी को भी दिखाई न देना) स्थापित कर दिया है। अब तुम्हें इस घने सेम पर्वत के शिखर के पास जिन दो वृक्ष के बीच एक पत्थर की शिला के ऊपर नाग के जोड़े का दर्शन होगा उसी शिला के चारों तरफ पुनः सातवीं बार मन्दिर का निर्माण करो यह सातवां मन्दिर भविष्य में प्रकटा-सेम मन्दिर के नाम से विख्यात होगा तथा कलियुग में इस मन्दिर के गर्भ-गृह में स्थित यह शालिग्राम शिला भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करने वाली होगी जिससे इस तीर्थ की कीर्ति युगों तक अटल रहेगी तथा यहाँ मैं सेमनागराजा के उप-नाम से जाना जाऊंगा तथा मेरी पश्चिम द्वारिका के लुप्त • होते ही मेरी निवास स्थली उत्तर द्वारिका प्रकटा सेम होगी। भक्तों को कठिन कलिकाल में सभी ऋद्धि-सिद्धियाँ इस स्थान के दर्शन मात्र से प्राप्त होंगी।

RESEARCH AND WRITTEN BY

ATULYA  BHATT

Atuya bhatt

8 COMMENTS

LEAVE A REPLY